डाॅक्टरी भुल गये, राजनीति अच्छी सीख गये
![]() |
| भुख से तड़पता शिवकुमार का भाई, गांव वाले भोजन कराते हुए |
देश का सबसे अच्छा पीडीएस सिस्टम छत्तीसगढ़ राज्य का है, ये कहना है देश के सर्वोच्च न्यायालय का, किन्तु उसी राज्य में भुख से बच्चे की मौत हो जाती है, कर्ज से किसान मर जाता है, उस पर देश की यह सर्वोच्च न्यायालय क्या कभी किसी सरकार को क्या कभी किसी नौकरशाह को इस बात के लिये कटघरे में खड़ा करेगी कि कैसे जरूरत मंद लोगों तक योजनाओं का लाभ न पहुंच कर सम्पन्न लोग इसका लाभ ले रहे हैं। जिस देश में आजादी के बाद से लगातार 7 दशकों तक अरबों रूपये केवल रोटी, कपड़ा और मकान के नाम पर खर्च किये गये हैं वहां आज़ादी के 7 दशक बाद भी भुखमरी और लाचारी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। सरकार न तो जरूरतमंदों तक दो वक्त की रोटी पहुंचा पा रही है और ना रोजगार के साधन उपलब्ध करा पाने में समर्थ है। किन्तु फिर भी प्रदेश के मुखीया डाॅ. रमन सिंह अपने आप को संवेदनशील मुख्यमंत्री बताते फिर रहे हैं। लोक सुराज, ग्राम सुराज और विकास यात्रा के नाम पर पर प्रत्येक वर्ष करोड़ों रूपये मुख्यमंत्री व मंत्रियों के हेलिकाप्टर व कार्यक्रमों पर खर्च हो जाते हैं, किन्तु भुख से तड़पते बच्चे को अन्न का निवाला नहीं मिल पाता। सरगुजा जिले की इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि जरूरतमंदों तक सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं पहुंच पाता है। तमाम सरकारी योजनाओं के बाद भी क्रियान्यवन के मामले में न तो शासन-प्रशासन और न ही राजनैतिक क्षेत्र में काम करने वाले दलीय कार्यकर्ता व जनप्रतिनिधी संजीदगी दिखाते हैं, वरना शिवकुमार की मौत यूं ही नहीं हो जाती। भाजपा के जिस जांच दल ने यह कह दिया कि शिव कुमार के पिता मानसिक रोगी और शराबी हैं, उनसे मेरा यह प्रश्न है कि यदि वे मानसिक रोगी थी तो सरकार का वह तंत्र कहा है जो कि अभिभावक की स्थिति ठीक नहीं होने पर बच्चों के परवरिश का जिम्मा उठाता या फिर वह तंत्र कहा है जो कि मानसिक रोगी का ईलाज कराता, क्या सरकार की नाकामी को छुपाने किसी को भी मानसिक रोगी ठहरा देंगे। शिवकुमार के मौत की पड़ताल से पता चलता हे कि जागरूकता के अभाव में न तो शिवकुमार के परिवार के पास मनरेगा के कार्य का जाॅब कार्ड था और न ही राशन कार्ड, घर की जमीन भी भूमि अधिग्रहण की भंेट चढ़ चुकी थी। ये सारे कार्य केवल इसलिये रूक गये थे क्योंकि सरकारी नुमाइंदों को जगाने के लिये किसी मौत का इंतजार था। क्या भाजपा का वह जांच दल यह बता पायेगा कि यदि शिव कुमार के पिता मानसिक रोगी थे तो शिव कुमार के मौत के बाद उन्हीं के नाम पर राशन कार्ड, मनरेगा का जाॅब कार्ड, मुआवजा की राशि और जमीन अधिग्रहण के मुआवजा की राशि भी क्यों दी जा रही है? या तो भाजपा के जांच दल के सदस्य सरकारी लापरवाही को छुपाने झुठ बोल रहे हैं या फिर सरकारी तंत्र मानसिक रोगी के नाम पर सारी सुविधाएं जारी कर रहा है, जांच तो दोनोें की होनी चाहिए कि आखिर सच क्या है ?
मैनपाट के नर्मदापुर स्थित खालपारा निवासी शिव कुमार की भुख से मौत जहां मानवता को शर्मसार करने वाली घटना है तो वहीं दूसरी ओर 4 वर्ष के अबोध बालक की मौत ने मैनपाट के ग्रामीच अंचल में उम्मीद के एक नई किरण का प्रसार किया है कि शायद अब सरकारी योजनाएं जरूरतमंदों तक पहुंच सकेगी। शिवकुमार के मौत के बाद होश में आयी प्रशासन ने घर-घर जाकर राशन कार्ड बनाने, लंबित मुआवजा का आवंटन करने एक वर्ष से अधिक समय से बंद महात्मा गांधी रोजगार गारण्टी योजना का संचालन जैसे कार्यों को तत्परता से शुरू करने का रास्ता साफ कर दिया है। जिससे शिवकुमार की तरह ही मौत के मुंह पर खड़े कई बच्चों को सरकार ने सरकारी आश्रमों में रखकर उनका पोषण करने का जिम्मा उठाया है। यह छत्तीसगढ़ सरकार की विफलता और भ्रष्टाचार नहीं तो और क्या है कि प्रदेश के कुल परिवार संख्या से भी अधिक राशन कार्ड बनने के बावजुद जरूरतमंदों तक राशन नहीं पहुंच पा रही है और अन्न के दाने-दाने के लिये प्रदेश का अन्नदाता ही तड़प रहा है।
इस घटना से देश को यह सबक लेना चाहिए कि देश की तेजी से बढ़ती जनसंख्या के लिये खाद्यान्न की आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करना नितांत आवश्यक है, जिससे कोई भी भारतीय भुखे पेट न सो सके। साथ ही खाद्यान्न के क्षेत्र में भारत दुनिया का नेतृत्व कर सके। अतः भविष्य में खाद्य सुरक्षा के लिये असरदार कार्य व्यापक तौर पर करने की आवश्यकता है। एक तरफ जनसंख्या बढ़ रही है दूसरी तरफ कृषि योग्य भूमि का क्षेत्रफल भी घट रहा है। देश में उद्योग के विकास और आवासीय परियोजनाओं के चलते पिछले दो दशक में कृषि योग्य भूमि लगभग 2 प्रतिशत तक घटी है। ऐसे में यह सरकार की जवाबदारी है कि ऐसे किसानोें को जिनकी भूमि, भूमि अधिग्रहण की भेंट चढ़ चुकी है, उन्हें खाद्यान्न सुरक्षा का लाभ दिया जाये, ऐसे परिवार भुख व लाचारी से न मरें। उनकी मुआवजा की राशि बैंकों में इस तरह से फिक्स करायें जायें की उसका एक समुचित लाभ परिवार को हर महिने एक निश्चित रकम के रूप में लम्बे समय तक मिलता रहे, जिससे परिवार सम्हल सके और भुखमरी और लाचारी से बचे।
भोजन मुनष्य की मूलभूत आवश्यकता हे। मानव बिना कुछ खाए ज्यादा दिनों तक जिंदा नहीं रह सकता। इसी वजह से हर सरकार का यह दायित्व बनता है कि वह देश की सीमाओं का परवाह किये बिना उन लोगों को खाद्य सुरक्षा मुहैया कराये जो कि अन्न के दाना के लिये तरस रहे हैं। जिनके पास खाद्यान्न क्रय करने हेतु उचित प्रबंध नहीं है। इस दिशा में पूर्ववर्ती सरकार ने खाद्यान्न सुरक्षा कानून बनाया गया है, किन्तु समुचित क्रियान्वयन नहीं होने के कारण देश में ऐसी स्थिति निर्मित हो रही है। खाद्यान्न सुरक्षा कानून का उद्देश्य देश की दो तिहाई आबादी को भारी सब्सिडी वाला खाद्यान्न अधिकार के तौर पर प्रदान करना है। किन्तु इस दिशा में हम क्या कुछ कर पाये हैं यह केन्द्र व राज्य सरकार को विचार करना होगा।
शिवकुमार की मौत पर राजनीति जरूर हुये, किन्तु इस पर सरकार को यह सोचना होगा कि क्या जमीनी स्तर पर सरकारी तंत्र फेल है या फिर सरकारी योजनाएं भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ चुके हैं। कैसे सम्पन्न परिवारों को राशन कार्ड का लाभ मिल रहा है और गरीब परिवार भूख से मर रहा है। वर्ष भर कैसे गांव में महात्मा गांधी रोजगार गारण्टी योजना का कार्य बंद रहा और कैसे मनरेगा के कार्य के वर्षाें से भुगतान लंबित हैं। आखिर यह सरकार की विफलता है या तंत्र की खराबी विचार किया जाना चाहिए।
डाॅक्टर मुख्यमंत्री को मरिज के मरने से पूर्व ठीक ढंग से नब्ज पकड़ कर समुचित ईलाज की सुविधाएं उपलब्ध करानी चाहिए अन्यथा प्रदेश के मुखिया होने के नाते इन विरोधों और राजनीति उठापटक को तो बर्दाश्त करना ही होगा। डाॅक्टर साहब आपसे लगातार मरिज का नब्ज पकड़ने में गलती हो रही है कभी आंख फोड़वा, तो कभी गर्भाष्य काण्ड, कभी नसबंदी आॅपरेशन मुंह चिढ़ाती है तो कभी शिवकुमार आपकी ओर देख रहा है। साहब! अब ऐसा लगने लगा है कि राजनीति उठा-पटक सरकार को मैनेज करते करते आप डाॅक्टरी भुल गये और राजनीति बहुत अच्छी तरह सीख गये। - अंचल ओझा, अम्बिकापुर
